हंडिया तहसीलदार की नाक के नीचे राजस्व अमले का ‘खेल’? 7 अगस्त को अतिक्रमण माना, 20 अगस्त को शासकीय रास्ता अतिक्रमण मुक्त! CM हेल्पलाइन की रिपोर्टों ने खड़े किए गंभीर सवाल
हंडिया। ग्राम हंडिया के बस स्टैंड क्षेत्र में अतिक्रमण को लेकर दर्ज सीएम हेल्पलाइन शिकायत क्रमांक 38457465 अब महज शिकायत नहीं, बल्कि राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करने वाला मामला बन गई है। एक ही शिकायत में महज 13 दिन के अंतराल पर सामने आई विभागीय रिपोर्टों में अतिक्रमण की स्थिति ही बदल गई।
7 अगस्त की तहसील हंडिया की रिपोर्ट में खसरा नंबर 98, रकबा 0.575 हेक्टेयर शासकीय रास्ते के दोनों ओर दुकानदारों द्वारा दुकान की सामग्री रखकर अस्थायी अतिक्रमण किए जाने की बात स्पष्ट रूप से दर्ज है। इतना ही नहीं, रिपोर्ट में संबंधित दुकानदारों को अस्थायी अतिक्रमण हटाने के लिए सूचना पत्र जारी करने की बात भी कही गई।
लेकिन कहानी यहीं पलट जाती है।
20 अगस्त की अंतिम रिपोर्ट में हल्का पटवारी की रिपोर्ट के आधार पर दावा किया गया कि शासकीय रास्ता मौके पर पूरी तरह खुला और अतिक्रमण मुक्त है। इसी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि दुकानदार अपनी सामग्री बाहर रखकर खसरा नंबर 89/2 की निजी भूमि का अस्थायी उपयोग कर रहे हैं।
13 दिन में ऐसा क्या हुआ कि अतिक्रमण ही गायब हो गया?
सीएम हेल्पलाइन के रिकॉर्ड में दर्ज दोनों रिपोर्ट अब राजस्व विभाग की कार्यशैली पर सीधे सवाल खड़े कर रही हैं।
जब 7 अगस्त को विभाग ने स्वयं अतिक्रमण स्वीकार किया और दुकानदारों को नोटिस जारी करने की बात दर्ज की, तो 20 अगस्त को वही रास्ता अतिक्रमण मुक्त कैसे हो गया?
क्या नोटिस के बाद दुकानदारों ने सामग्री हटा ली थी?
अगर हटा ली थी तो अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का स्पष्ट उल्लेख अंतिम रिपोर्ट में क्यों नहीं है?
और अगर मौके पर अतिक्रमण था ही नहीं, तो 7 अगस्त की रिपोर्ट में अतिक्रमण स्वीकार कर नोटिस जारी करने की बात किस आधार पर दर्ज की गई?
तहसीलदार की नाक के नीचे राजस्व अमले की कार्यप्रणाली पर सवाल
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पूरा विवाद राजस्व विभाग की निगरानी वाले क्षेत्र से जुड़ा है। शिकायत पर अलग-अलग तारीखों में सामने आई रिपोर्टों में विरोधाभास ने स्थानीय स्तर पर चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या राजस्व अमले ने मौके की स्थिति का निष्पक्ष निरीक्षण किया था या फिर रिपोर्टें कागजों तक ही सीमित रहीं? स्थानीय लोगों की मांग है कि पूरे मामले में मौके का दोबारा निष्पक्ष सीमांकन/निरीक्षण कराया जाए और संबंधित खसरा नंबरों की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए।
शिकायतकर्ता की असहमति के बाद भी शिकायत हुई ‘स्पेशल क्लोज’
रिकॉर्ड के अनुसार शिकायतकर्ता सचिन तिवारी ने पूर्व निराकरण पर असहमति जताई थी। इसके बाद शिकायत उच्च स्तर पर भेजी गई। रिकॉर्ड में 20 अगस्त को पूर्व निराकरण को उच्च स्तर से अमान्य किए जाने का उल्लेख भी दर्ज है। इसके बाद नई रिपोर्ट के आधार पर शिकायत को स्पेशल क्लोज कर दिया गया।
अब सवाल सिर्फ शिकायत बंद होने का नहीं है।
सवाल यह है कि एक ही शिकायत में राजस्व विभाग की दो रिपोर्टों में इतना बड़ा अंतर क्यों आया?
अब जांच जरूरी या फिर रिकॉर्ड ही काफी है?
स्थानीय स्तर पर मांग उठ रही है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि—
7 अगस्त को अतिक्रमण किस आधार पर दर्ज किया गया?
दुकानदारों को जारी किए गए सूचना पत्रों पर क्या कार्रवाई हुई?
क्या मौके से सामग्री हटाई गई?
20 अगस्त को निरीक्षण किस अधिकारी/कर्मचारी ने किया?
खसरा नंबर 98 और 89/2 की वास्तविक मौके की स्थिति क्या है?
दोनों रिपोर्टों में विरोधाभास की जिम्मेदारी किसकी है?
सीएम हेल्पलाइन का रिकॉर्ड खुद सवाल पूछ रहा है—
जब 7 अगस्त को अतिक्रमण था, तो 20 अगस्त को महज 13 दिन में शासकीय रास्ता अचानक अतिक्रमण मुक्त कैसे हो गया?
अब निगाहें तहसीलदार और राजस्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों पर हैं कि वे इस विरोधाभास की स्पष्ट और तथ्यात्मक वजह सामने रखते हैं या नहीं।

