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दुनिया भर के वे छात्र आंदोलन जिससे हिल गई सत्तासीन सरकारें

नेपाल। नेपाल में जिस तरह से युवाओं का आंदोलन भड़का उसकी तस्वीर पूरी दुनिया ने देखी। फेसबुक, इंस्टाग्राम सहित सोशल मीडिया साइट्स पर बैन से शुरू हुआ विवाद बड़े जनाक्रोश में बदल गया। इसके निशाने पर प्रधानमंत्री ओली की कुर्सी आ गई। उन्हें न केवल अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा बल्कि जान बचाने के लिए खुफिया जगह पर छिपने को भी मजबूर हो गए। ये कोई पहली बार नहीं है, जब छात्रों का आक्रोश इसकदर भड़का की निशाने पर सत्ता आ गई। नेपाल से पहले चीन, अमेरिका, फ्रांस के साथ-साथ भारत भी युवा प्रदर्शनकारियों के निशाने पर आ चुका है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां छात्र आंदोलनों ने कई बार राजनीति को प्रभावित किया है। सीएए के खिलाफ प्रदर्शनों के मामले अभी भी चल रहे। तेलंगाना राज्य की मांग जैसे कई क्षेत्रीय आंदोलनों में छात्रों का बड़ा योगदान था।

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इसके पहले वीपी सिंह की सरकार गिर गई थी। छात्रों ने इमरजेंसी के खिलाफ प्रदर्शनों में भी बड़ी भूमिका निभाई थी। छात्र-समर्थित जेपी आंदोलन से 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी हार गई थीं। कई छात्र नक्सल आंदोलन में भी शामिल हुए थे। यह आंदोलन 60 के दशक में शुरू हुआ था। भारत की आजादी में भी छात्रों का बड़ा योगदान था। जेपी के नेतृत्व में ऐसा आंदोलन छिड़ा, जिसने तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार को हिला दिया था। इसके अलावा आरक्षण आंदोलन की आंच केंद्र को हिलाने में सफल रही थी। इन आंदोलनों में असम गण परिषद के नेतृत्व में भी हुआ छात्र आंदोलन शामिल था, जिसके बाद असम में युवा नेता प्रफुल्ल महंत उभरे, जिन्होंने युवा सीएम के तौर पर राज्य की बागडोर भी संभाली। असम गण परिषद का गठन 1985 में हुआ था। यह पार्टी असम आंदोलन के बाद बनी थी। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और ऑल असम गण संग्राम परिषद ने मिलकर पार्टी को बनाया था। प्रफुल्ल कुमार महंत पार्टी के पहले अध्यक्ष थे। वहीं विदेश में फ्रांस की छात्र क्रांति बहुत मशहूर है। यह राजनीतिक, सांस्कृतिक प्रदर्शन था, इसमें मजदूरों ने भी साथ दिया। दो-तिहाई मजदूरों ने बेहतर काम करने की स्थिति की मांग की। उस समय सरकार बच गई, लेकिन फ्रांस बदल गया। रूढ़िवादी सोच की जगह खुले विचारों वाला समाज बना। लोगों को अच्छी तनख्वाह मिलने लगी।