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23 साल पुराने आदेश पर सवाल, हिंदू पक्ष ने पूछा—ना वजूखाना, ना मीनार, फिर मस्जिद कैसे?

धार। मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर चल रहे विवाद में हाईकोर्ट में अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से अदालत में मांग की गई कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई को भोजशाला परिसर के मूल धार्मिक स्वरूप को बहाल करने का निर्देश दिया जाए और वहां केवल हिंदुओं को पूजा की अनुमति दी जाए।

एएसआई के 2003 के आदेश को दी चुनौती
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के वकील विष्णु शंकर जैन ने न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की खंडपीठ के समक्ष एएसआई के 7 अप्रैल 2003 के आदेश को चुनौती दी। इस आदेश के तहत हिंदुओं को हर मंगलवार पूजा करने और मुसलमानों को हर शुक्रवार नमाज अदा करने की अनुमति दी गई है।

वकील विष्णु शंकर जैन ने अदालत में कहा कि एएसआई का यह आदेश प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 का खुला उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी संरक्षित स्मारक या तीर्थ स्थल का उपयोग उसके मूल स्वरूप के विपरीत उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता।

पूजा के अधिकार के उल्लंघन का आरोप
हिंदू पक्ष की ओर से कहा गया कि एएसआई के आदेश के आधार पर लागू व्यवस्था हिंदुओं के पूजा के अधिकार का उल्लंघन करती है। साथ ही उन्होंने मुस्लिम पक्ष की उस आपत्ति को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि यह मामला जनहित याचिका नहीं बल्कि सिविल विवाद है और इसकी सुनवाई सिविल कोर्ट में होनी चाहिए।

हिंदू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष के तर्कों का खंडन करते हुए कहा कि उसके द्वारा दायर जनहित याचिका कोई दीवानी मुकदमा नहीं है। साथ ही हिंदू पक्ष ने यह भी पूछा कि जब उस इमारत में मीनार और वजूखाना दोनों नहीं है तो वह मस्जिद कैसे कहलाएगी। इसके साथ ही सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने अदालत से गुहार लगाई की कि वह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को 11वीं सदी के इस संरक्षित स्मारक का ‘मूल धार्मिक स्वरूप’ बहाल करने का निर्देश दे क्योंकि ASI की मौजूदा व्यवस्था से उसके बुनियादी अधिकारों का हनन हो रहा है।

याचिकाकर्ताओं में शामिल संगठन ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के वकील विष्णु शंकर जैन ने विवादित स्मारक को लेकर ASI के सात अप्रैल 2003 के एक आदेश को जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी और स्मारक में केवल हिंदुओं को उपासना का अधिकार दिए जाने की गुहार लगाई।

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दरअसल ASI के वर्तमान आदेश के अनुसार विवादित परिसर में हर मंगलवार को हिंदुओं और हर शुक्रवार को मुस्लिमों को उपासना की अनुमति दी गई है। जैन ने कहा कि ASI का यह आदेश प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन करता है।

ASI के आदेश को बुनियाद अधिकार का उल्लंघन बताया
विष्णुशंकर जैन ने कहा कि इस कानून के एक प्रावधान में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि अगर केंद्र सरकार द्वारा संरक्षित कोई स्मारक पूजास्थल या तीर्थस्थल है, तो उसका उपयोग उसके स्वरूप के विपरीत किसी भी उद्देश्य के लिए नहीं किया जाएगा। जैन ने कहा, ‘ASI के साल 2003 में दिए गए आदेश के आधार पर जारी व्यवस्था से हमारे उपासना के अधिकारों के साथ ही बुनियादी अधिकारों का भी उल्लंघन हो रहा है।’ सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष के वकील ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पर विवादित स्मारक के ‘मूल धार्मिक स्वरूप’ के अनुरूप कार्य करने का वैधानिक दायित्व है।

विष्णुशंकर जैन ने दिया मुस्लिम पक्ष के तमाम दलीलों का जवाब
जैन ने मुस्लिम पक्ष की इस आपत्ति को खारिज किया कि भोजशाला विवाद को लेकर ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ की जनहित याचिका वस्तुतः एक दीवानी मुकदमा है और इसे उच्च न्यायालय की रिट कार्यवाही के बजाय किसी दीवानी अदालत में चलाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा,’यह कोई दीवानी मुकदमा नहीं है और इसमें तथ्यों से संबंधित कोई विवादित प्रश्न नहीं हैं।’

मुस्लिम पक्ष ने दिया उपासना स्थल अधिनियम का हवाला
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि धार का विवादित स्मारक देश की आजादी की तारीख यानी 15 अगस्त 1947 को मस्जिद के रूप में वजूद में था, लिहाजा उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 के प्रावधानों के तहत इसका धार्मिक स्वरूप बदला नहीं जा सकता। हालांकि जैन ने उनकी इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि भोजशाला पर यह कानून लागू नहीं होता क्योंकि वह एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक है।

हिंदू पक्ष के वकील ने पूछा- मीनार या वजूखाना नहीं तो मस्जिद कैसे
उधर हिंदू पक्ष के एक अन्य याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी के वकील मनीष गुप्ता ने मुस्लिम पक्ष के दावों पर सवाल उठाए और कहा कि विवादित स्मारक में कोई मीनार या वजूखाना (नमाज से पहले हाथ-मुंह धोने का स्थान) नहीं है, ऐसे में इसे मस्जिद कैसे कहा जा सकता है?

तिवारी ने इमारत के जैन मंदिर होने के दावे को भी नकारा
साथ ही तिवारी ने भोजशाला के जैन मंदिर होने के दावे को भी गलत बताया और कहा कि यह स्मारक परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा 1034 में स्थापित सरस्वती मंदिर है। मामले में अगली सुनवाई 11 मई को होगी।

बता दें कि उच्च न्यायालय भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर दायर पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है। धार की भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है।