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सैटेलाइट की परमाणु घड़ी में आई खराबी, भारतीय सेनाओं के सामने खड़ी हुई चुनौती

नई दिल्ली। भारत का स्वदेशी रीजनल नैविगेशन सिस्टम बहुत बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है। नैवआईसी नैविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन के सैटेलाइट की परमाणु घड़ी में आई खराबी की वजह से इसके सामरिक और रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। यह चिंता इसलिए बढ़ गई है कि इंडियन रीजनल नैविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम-1एफ सैटेलाइट में लगा अंतिम संचालित परमाणु घड़ी ने भी 10 मार्च को अचानक काम करना बंद कर दिया। इसके बाद पोजिशनिंग, नैविगेशन और टाइमिंग सेवाओं के लिए सिर्फ तीन ही सैटेलाइट बच गए, जो इस काम के लिए सक्षम हैं।

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मीडिया रिपोर्ट में एक्सपर्ट कहते हैं कि नैवआईसी सिस्टम के प्रभावी तरीके से काम करने के लिए कम से कम ऐसे चार सैटेलाइट की जरूरत है, जिनमें परमाणु घड़ियां ठीक से काम कर रही हों। अगर यह न्यूनतम जरूरत पूरी नहीं होती है तो चाहे नागरिक उपकरण हों या फिर रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरण, नैवआईसी सिस्टम भरोसेमंद नहीं रह जाता। इसरो की एक पूर्व वैज्ञानिक अनन्या रे के मुताबिक नैवआईसी जैसे सिस्टम दो तरह के सिंग्नलों पर काम करते हैं। एक ओपन सिंग्नल है, जो सिविलियन इस्तेमाल के लिए होता है और दूसरा प्रतिबंधित और संवेदनशील होते हैं, जो सिंग्नल बहुत ही सटीक होते हैं और इसका इस्तेमाल सशस्त्र सेनाएं करती हैं। सैन्य कार्रवाइयों के लिए यह बहुत ही अहम है, क्योंकि इससे इसकी सटीकता प्रभावित होती है।

रिपोर्ट के मुताबिक नैविगेशन सैटेलाइट सेनाओं के लिए लॉजिस्टिक, मैपिंग और योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक्सपर्ट विदेशी नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम को सैन्य जरूरतों के लिए सुरक्षित नहीं मानते हैं, क्योंकि विशेष तौर पर संघर्ष के दौरान युद्ध रणनीति के दुश्मनों के हाथ लगने का जोखिम बढ़ जाता है। अगर दुश्मनों तक संवेदनशील सिंग्नल पहुंच गया तो वह उसका फायदा भारत के खिलाफ उठा सकते हैं। कारगिल युद्ध के समय अमेरिका ने जीपीएस डेटा देने से मना कर दिया था। इसके बाद स्वदेशी नैवआईसी सिस्टम विकसित करने पर काम शुरू हुआ था। वैसे इंडियन रीजनल नैविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम कार्यक्रम पर औपचारिक काम 2013 से 2018 के बीच हुआ, ताकि सामरिक क्षेत्र में पूरी तरह से स्वायत्तता मिल सके, लेकिन इस सिस्टम को कई तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें सैटेटाइटों पर लगे परमाणु घड़ियों में आने वाली खराबी सबसे बड़ी समस्या है। सटीक नैविगेशन और पोजिशनिंग के लिए बहुत ही सटीक टाइमिंग की जरूरत होती है और उसके लिए यह घड़ियां बहुत ही अहम हैं।