अब वक्त बदल गया है, टीचर क्लास में बच्चों को जलील नहीं कर सकते’ – छात्रों को पनिशमेंट पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने…?
सुप्रीम कोर्ट में छात्रों को कक्षा में दी जाने वाली सजा को लेकर जोरदार बहस हुई। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि _‘अब वक्त बदल गया है। टीचर क्लास में बच्चों को जलील नहीं कर सकते’_। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुशासन के नाम पर बच्चों का अपमान या मानसिक उत्पीड़न स्वीकार नहीं किया जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि क्या है..?
यह सुनवाई छात्रों को शारीरिक और मानसिक दंड देने के बढ़ते मामलों को लेकर दायर याचिकाओं पर हो रही है। कोर्ट के सामने सवाल था कि अनुशासन बनाए रखने के लिए शिक्षक कहां तक सजा दे सकते हैं और कहां से यह बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन बन जाता है।
कानून क्या कहता है…?
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान _निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009_ की धारा 17 का जिक्र किया। इस कानून में साफ लिखा है कि किसी भी बच्चे को शारीरिक दंड नहीं दिया जाएगा और न ही उसका मानसिक उत्पीड़न किया जाएगा। उल्लंघन करने पर शिक्षक और स्कूल प्रबंधन के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई हो सकती है।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले
1. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट : कोर्ट ने कहा था कि _‘अनुशासन या शिक्षा के नाम पर स्कूल में बच्चे को शारीरिक हिंसा के लिए मजबूर करना क्रूरता है। बच्चे को सुधारने के लिए शारीरिक दंड देना शिक्षा का हिस्सा नहीं है’_। कोर्ट ने यह भी कहा कि जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है।
2. केरल हाईकोर्ट : एक मामले में कोर्ट ने माना कि शिक्षक को अनुशासन बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन दंड ‘सद्भावना से’ और ‘न्यूनतम’ होना चाहिए।
3. सुप्रीम कोर्ट 2021 : कोर्ट ने कहा था कि अनुशासनहीनता के लिए डांटना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं है, जब तक बार-बार उत्पीड़न और जानबूझकर अपमान के आरोप न हों। साथ ही कोर्ट ने कहा कि _‘कानून में छात्रों की पिटाई जायज नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शिक्षक अपनी आंखें बंद कर लें’_।
शिक्षकों की जिम्मेदारी क्या है…?
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि छात्रों को अनुशासन सिखाना शिक्षक का दायित्व है। लेकिन यह अनुशासन डर और अपमान से नहीं, बल्कि संवाद और मार्गदर्शन से स्थापित होना चाहिए। बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने भी कहा था कि स्कूल का उद्देश्य सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि जीवन के सभी पहलुओं के लिए तैयार करना है।
एनएचआरसी और सरकार का रुख
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी दोहराया है कि RTE एक्ट 2009 की धारा 17 के तहत बच्चों के साथ शारीरिक दंड या मानसिक उत्पीड़न की मनाही है। रीवा के एक मामले में मानसिक उत्पीड़न के आरोप में कक्षा शिक्षक को 6 महीने के लिए निलंबित भी किया गया था।
अब आगे क्या…?
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में गाइडलाइन तय कर सकता है कि कक्षा में अनुशासन कैसे रखा जाए और साथ ही बच्चों की गरिमा कैसे बचे। कोर्ट का फोकस ‘सजा’ के बजाय ‘सुधारात्मक’ उपायों पर है।
निष्कर्ष यह है कि
न्यायमूर्ति संदीप मेहता की टिप्पणी से साफ है कि शिक्षा का माहौल अब बदल चुका है। शिक्षक अब बच्चों को डराकर नहीं, बल्कि समझाकर अनुशासित कर सकते हैं। अपमान, ताने या सार्वजनिक रूप से जलील करना कानून और संविधान दोनों के खिलाफ है।
_विशेष बात – यह खबर सार्वजनिक अदालत की कार्यवाही और विभिन्न न्यायिक टिप्पणियों पर आधारित है।_

