आज डोल ग्यारसका त्यौहार है जिसका-श मध्यप्रदेश, राजस्थान और मालवा-निमाड़ में इसका बहुत बड़ा महत्व है। इसे जलझूलनी एकादशी, वामन जयंती और परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।
श्रीकृष्ण को डोल में झुलाने की कथा – मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन माता यशोदा ने बाल कृष्ण को पहली बार पालने (डोल) में झुलाया था और उनका जलवा-पूजन किया था। इसलिए इस दिन को कृष्ण जन्म के बाद उनका पहला सार्वजनिक उत्सव माना जाता है।
वामन अवतार का जन्म – इसी दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था। राजा बलि के अहंकार को तोड़ने के लिए वामन रूप में प्रकट हुए थे। इसलिए इसे वामन जयंती भी कहते हैं।
चातुर्मास में करवट बदलते हैं विष्णु जी- आषाढ़ में देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु सो जाते हैं। आज परिवर्तिनी एकादशी को वे सोते-सोते करवट बदलते हैं, इसलिए पर्व को परिवर्तिनी भी कहा गया है।
आज के दिन क्या होता है….?
मप्र में आज जो होता है, वो देश में कहीं और नहीं होता –
भगवान कृष्ण का डोल – चल समारोह आज हर गाँव-शहर में कृष्ण मंदिरों से भगवान कृष्ण की मूर्ति को सजे-धजे डोल (पालकी) में बिठाकर जुलूस निकाला जाता है। हरदा-खिरकिया टिमरनी में भी आज यही होगा।भक्त बहुत श्रद्धा के साथ शहर में भगवान के डोल निकालेंगे और अंत में नदी तालाब पास ले जाकर भगवान को स्नान कराया जायेगा। भगवान कृष्ण विष्णु के मंदिरो में विशेष साज सज्जा की गई है।
जलझूलनी एकादशी पर 56 भोग – भगवान के डोल को तालाब, नदी या बावड़ी के किनारे ले जाया जाता है। वहाँ भगवान को जल में स्नान कराया जाता है, नौका विहार कराया जाता है। इसलिए इसका नाम है – जलझूलनी एकादशी कहा जाता है।
आज अनेक समितियां गणेशोत्सव मे भगवान गणेश को 56 भोग लगा रही है, वैसे ही हर जगह छोटे कृष्ण कन्हैया को 56 तरह के पकवानों का भोग लगता है।
राखी विसर्जन– बहनें आज भाइयों की कलाई से राखी खोलकर डोल में चढ़ा देती हैं। मान्यता है कि इससे भाई की उम्र बढ़ती है।
अनंत चतुर्दशी की तैयारी– आज से गणेश विसर्जन की शुरुआत हो जाती है। कल से अनंत चौदस तक बड़े गणपति विसर्जित होंगे।
आज के दिन व्रत रखने से वाजपेय यज्ञ के बराबर फल मिलता है, ऐसा शास्त्रों में लिखा है।

