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अमृतादेवी नेे पेड़ो को बचाने के लिए दी थी जान,जीवनदायिनी आक्सीजन देनेे वाले पेडो को सरंक्षण की है आवश्यकता

कैलाश सेजकर ,मकड़ाई समाचार हरदा। पर्यावरण को लेकर जागरुकता का सबक अगर इतिहास में है तो वह शहीद अमृता देवी की कुर्बानी। एक ऐसी कहानी जिसमें एक महिला ने पेड़ो की रक्षा के लिए खुद को बलिदान कर दिया।अमृता देवी का साथ उनके परिजन और ग्रामीणो ने दिया। इसके बाद भी आज ये देश उनके बलिदान को भूल गया है। देश में कई स्थानों पर सागौन की अवैध कटाई हो रही है। मप्र के छतरपुर में बक्सवाह का जंगल काटने की तैयारी चल रही है। क्या आज भी कोई अमृतादेवी और 369 लोगो को शहीद होना पडे़गा।

कोरोना काल मे लाखो लोगो ने आक्सीजन की कमी से अपनी जान गंवाई

लोगो को जागने की आवश्यकता है। सोचिए अगर जंगल कट गए तो कृत्रिम आक्सीजन के प्लांट भी काम नही कर पायेगे। हम अभी कोरोना काल से सबक नही ले पा रहे हैं। जिसमे लाखो लोगो ने आक्सीजन की कमी से अपनी जान गंवाई है उस वेदना और दर्द को उनके परिजनो के चेहरे पर स्पष्ट देख सकते हैं। पेड़ से मिलने वाली आक्सीजन पर हम जी रहे है। तो हमारे जीवन को देने वाले पेड़ो को काटना मतलब हमे काटना हैा पौधारोपण तो औपचारिकता बन गया है। पौधारोपण किया फोटो खिंचार्इ्र और कुछ दिनों बाद पौधा गायब हो जाता है।ऐसे अभियान पर लाखो खर्च करनेे का क्या औचित्य है।

कौन है अमृता देवी

राजस्थान में खेजड़ली गांव की घटना है। जहां सन 1730 में राजस्थान के मारवाड़ में खेजड़ली नामक स्थान पर जोधपुर के महाराजा के आदेश पर सैनिको द्वारा हरे पेड़ों को काटा जा रहा था।पेड़ो को बचाने के लिए अमृता देवी बेनीवाल ने अपनी तीन बेटियां आसू , रत्नी और भागू के साथ 363 से अधिक अन्य बिश्नोई खेजड़ी के पेड़ों को बचाते हुए शहीद हो गए। खेजड़ली भारत के राजस्थान के जोधपुर जिले का एक गाँव है। इस गांव का नाम खेजहडली इस गाँव में 363 बिश्नोईयों को 1730 ई. में हरे पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी थी।

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पेड़ बचाओ चिपको आंदोलन
खेजड़ली गांव वह स्थान है जहाँ चिपको आंदोलन की उत्पत्ति भारत में हुई थी। इतिहास का अविस्मरणीय दिन था, काला मंगलवार खेजड़ली गाँव के लिए। 1730 ईसवी में भद्रा महीने (भारतीय चंद्र कैलेंडर) के 10 वें उज्ज्वल पखवाड़े के दिन अमृता देवी अपनी तीन बेटियों आसू, रत्नी और भागू बाई के साथ घर पर थीं। तभी अचानक उन्हें पता चला की मारवाड़ जोधपुर के महाराजा अभय सिंह के सैनिक उनके गांव खेजड़ी के पेड़ों को काटने आयें है।खेजड़ी के पेड़ों की लकड़ियों का इस्तेमाल महाराजा अभय सिंह अपने नए महल के निर्माण में करना चाहते थे।महाराजा अभय सिंह ने अपने आदमियों को खेजड़ी के पेड़ों से लकड़ियाँ प्राप्त करने का आदेश दिया था।

सिर साटे, रूंख रहे, तो भी सस्तो जांण

अमृता देवी ने राजा के सैनिकों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, क्योंकि बिश्नोई धर्म में हरे पेड़ों को काटना मना है। इसलिए अमृता देवी ने पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान भी देनो को तैयार थीं। उन्होंने कहा
सिर साटे, रूंख रहे, तो भी सस्तो जांण। जिसका अर्थ है कि “यदि किसी व्यक्ति की जान की कीमत पर भी एक पेड़ बचाया जाता है, तो वह सही है।”इसके पीछे जो आधार था वह गुरु भगवान जम्भेश्वर के नियम और उपदेश थे।जिन्होने कहा था कि
जीव दया पालणी, रूंख लीलो न घावें गुरू जाम्भेश्वर भगवान
जिसका अर्थ है कि “जीव मात्र के लिए दया का भाव रखें, और हरा वृक्ष नहीं काटे”

बरजत मारे जीव, तहां मर जाइए। गुरू जाम्भेश्वर भगवान
जिसका अर्थ है कि “जीव हत्या रोकने के लिये अनुनय-विनय करने, समझाने-बुझाने के बाद भी, सफलता नहीं मिले, तो स्वयं आत्म बलिदान कर दें”

पेड़ो को बचाने दिया बलिदान

इन्हीं उपदेशों का पालन करते हुए अमृता देवी ने पेड़ों को बचाने के लिए पेड़ से चिपक गई जिसके बाद महाराजा के सैनिकों द्वारा कुल्हाड़ी से वार करने पर उनकी मृत्यु हो गई। अमृता देवी के बलिदान के बाद उनकी तीनों बेटियों ने भी पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे दी। यह खबर पूरे गांव और और विश्नोई समाज में आग की तरह फैल गई जिसके बाद कुल 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान का बलिदान दिया।जब राजा को यह खबर पता चली तो उन्होने तुरंत सैनिको मना किया। आज सरकार अमृतादेवी के नाम से पुरुष्कार देती है। अमृतादेवी के सच्चे बलिदान को आज हम नही समझ पा रहे है। आज 300 साल बाद भी नही समझ पा रहे है तो यह हमारी बहुत बड़ी भूल है।अमृतादेवी और 363 विश्नोई भाईयो का बलिदान व्यर्थ न जाए। पौधारोपण को दिखावे के लिए नही आने वाली हमारी पीढ़ी को बचाने के लिए करना चाहिए।