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ग्वालियर कृषि यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने हवा में उगाया आलू

ग्वालियर। राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने 2 साल पहले रिसर्च के लिए खेती की एक नई तकनीक शुरू की थी। ये ऐरोपोनिक तकनीक थी, जिसके जरिए वैज्ञानिकों ने हवा में आलू उगाने का प्रयास शुरू किया था। ये प्रयास अब रंग ला चुका है और दो साल की शोध के बाद कृषि वैज्ञानिकों ने आलू के ऐसे बीज तैयार कर लिए हैं जो ना सिर्फ रोग रहित हैं बल्कि इसका प्रोडक्शन 50 गुना तक है।इनसे पैदा होने वाली आलू की फसल 400 गुना तक मिलती है।

ग्वालियर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कमाल
देश में कृषि क्षेत्र रिसर्च के बलबूते नए आयाम स्थापित करने में जुटा हुआ है। किसान की लागत कैसे बढ़े और कैसे नवाचार का फायदा किसानों को मिले, इस ओर ग्वालियर का राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय भी अपना योगदान दे रहा है। कृषि यूनिवर्सिटी ने अपनी ऐरोपोनिक्स यूनिट में पानी के जरिए हवा में आलू उगाये जा रहे हैं। जो जल्द ही किसानों की किस्मत बदलने को तैयार हो जायेंगे। असल में ये आलू ऐरोपोनिक तकनीक का इस्तेमाल कर उगाए गए हैं। या कहें आलू के बीज तैयार किये गए हैं। कृषि वैज्ञानिकों की भाषा में इस यूनिट में आलू के 20 वेराइटी के मिनी ट्यूबर तैयार किए जा रहे हैं, जो प्रोसेस होने के बाद किसानों के खेतों में फसल बनकर फायदा देंगे।

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टिशू कल्चर तकनीक से लैब में तैयार होता है पौधा
एरोपोनिक प्रोजेक्ट की इंचार्ज डॉ. सुषमा तिवारी ने बातचीत में बताया कि, ”एयरोपौनिक तकनीक में पौधे टिशू कल्चर के माध्यम से लैब में तैयार किए जाते हैं, जब ये पौधे एरोपोनिक यूनिट में ट्रांसप्लांट करने होते हैं तब एक महीने पहले इन पौधों की हार्डनिंग की जाती है। इसके बाद इन्हें ट्रांसप्लांट किया जाता है। पूरे मध्य प्रदेश में ये पहल राजमाता कृषि विश्व विद्यालय द्वारा की गई है।”

रोग फ्री होता है एरोपोनिक तकनीक से उगा बीज
इन पौधों में न्यूट्रिएंट देने के लिए फोगिंग सिस्टम का उपयोग किया जाता है. ऐसे में जो आलू के बीज यानी मिनी ट्यूबर बनते हैं वे उच्च गुणवत्ता वाले होते हैं और रोग मुक्त होते हैं। जिसका मतलब है खेत में उगने वाले आलू में रोग या वायरस का असर फसल पर पड़ता है, लेकिन इन आलुओं में ऐसी कोई बीमारी नहीं होती। एरोपोनिक में तैयार पौधे बीमारी फ्री होते हैं। ये हेल्दी पौधे होते हैं जिसकी वजह बीज अच्छी क्वालिटी का बनता है और प्रोडक्शन भी कई गुना ज़्यादा होता है।”

उद्देश्य के अनुसार मिलेगा आलू, किसानों के पास होंगे विकल्प
मध्य प्रदेश की इस शोध यूनिट का बड़ा फायदा किसानों को भी मिलने वाला है, क्योंकि जब अच्छी गुणवत्ता का बीज किसानों को मिलेगा, जब बीज में कोई बीमारी नहीं होगी तो उनका प्रोडक्शन भी अच्छा होगा। ऊपर से अभी जब किसान आलू के बीज लेते हैं तो उनके पास ज़्यादा विकल्प नहीं होते हैं। लेकिन विश्वविद्यालय 20 प्रजातियों के बीज तैयार कर रहा है, जिसमें किसानों के उद्देश्य के अनुसार वे आलू उगा सकेंगे। उदाहरण के लिए फ्रेंच फ्राई के लिए फ़्राइओम है, चिप्स के लिए चिपसोना आलू है। इस तरह उनके पास जरूरत के हिसाब से विकल्प भी होंगे।