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हंडिया : गौशाला होने के बावजूद सड़कों पर गौवंश का कब्जा, आखिर किसकी जिम्मेदारी?

ग्राम पंचायत, गौशाला प्रबंधन, स्थानीय प्रशासन और तहसील की कार्यप्रणाली पर सवाल; क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही खुलेगी जिम्मेदारों की आंख?

हंडिया। हंडिया की तस्वीर इन दिनों सवालों के घेरे में है। एक ओर शासन निराश्रित गौवंशों के संरक्षण के लिए गौशालाओं पर लाखों रुपये खर्च करने के दावे करता है, वहीं दूसरी ओर हंडिया की गलियां, मुख्य बाजार और राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) दिन-रात गौवंशों का बसेरा बने हुए हैं। हालात ऐसे हैं कि सड़कें वाहनों से कम और गौवंशों से ज्यादा भरी दिखाई देती हैं।

रात ढलते ही यह समस्या और विकराल हो जाती है। सड़क के बीचों-बीच बैठे गौवंश तेज रफ्तार वाहनों के लिए मौत का कारण बन सकते हैं। चालक अचानक ब्रेक लगाने को मजबूर हो जाते हैं और हर गुजरता पल किसी बड़ी दुर्घटना का खतरा बढ़ाता है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी दर्दनाक हादसे का इंतजार कर रहा है?

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सबसे हैरानी की बात यह है कि हंडिया में गौशाला मौजूद है, फिर भी सैकड़ों गौवंश सड़कों पर क्यों भटक रहे हैं? क्या गौशाला की क्षमता पर्याप्त नहीं है, क्या निराश्रित गौवंशों को वहां तक पहुंचाने की व्यवस्था कमजोर है, या फिर इस समस्या पर नियमित निगरानी का अभाव है? इन सवालों का जवाब ग्राम पंचायत, गौशाला प्रबंधन, स्थानीय प्रशासन और तहसील प्रशासन को देना चाहिए।

सबको मालूम है कि यह समस्या नई नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी है। शिकायतें होती हैं, चर्चा होती है, लेकिन हालात जस के तस बने रहते हैं। इसी वजह से शायद लोगों में यह धारणा बन रही है कि स्थायी समाधान की दिशा में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई जा रही।

अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी केवल बैठकों और दावों तक सीमित रहेंगे या फिर सड़कों से गौवंश हटाकर आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस और स्थायी कार्रवाई करेंगे। क्योंकि अगर भविष्य में कोई बड़ा हादसा होता है, तो सबसे पहले यही सवाल उठेगा—जब खतरा सबको दिखाई दे रहा था, तब जिम्मेदार क्या कर रहे थे?