सिस्टम की विफलता या समाज की संवेदनहीनता ?
_मप्र के सागर जिले से सामने आई यह हृदयविदारक घटना आधुनिक समाज और सिस्टम के दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है।_
मकड़ाई एक्सप्रेस 24 सागर। प्रदेश स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित हो रहे सागर शहर से शनिवार को मानवता को शर्मसार कर देने वाली एक तस्वीर सामने आई है। जहाँ एक ओर शहर में विकास की बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर एक असहाय बुजुर्ग को अपनी पत्नी के शव को हाथ ठेले पर रखकर श्मशान ले जाना पड़ा। यह घटना न केवल प्रशासन के दावों की पोल खोलती है, बल्कि समाज की गिरती संवेदनाओं को भी उजागर करती है।
मदद के अभाव में रास्ते में ही तोड़ा दम
जानकारी के अनुसार, पवन साहू (निवासी: ग्राम सौरई, मड़ावरा, जिला ललितपुर, यूपी) पिछले करीब 12-13 वर्षों से सागर रेलवे स्टेशन क्षेत्र में किराए के कमरे में रह रहे हैं। वह यहाँ सब्जी का ठेला लगाकर अपनी पत्नी पार्वती साहू के साथ जीवन यापन करते थे।
शनिवार सुबह अचानक पार्वती की तबीयत बिगड़ गई। गरीबी और जानकारी के अभाव में पवन ने एंबुलेंस को फोन करने के बजाय अपनी पत्नी को उसी सब्जी वाले ठेले पर लिटाया और अस्पताल की ओर दौड़ पड़े। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था; अस्पताल पहुँचने से पहले ही रास्ते में पार्वती ने दम तोड़ दिया।
भीड़ देखती रही, पर नहीं बढ़ाए किसी ने हाथ
सबसे विचलित करने वाला दृश्य सुबह 10 बजे का था, जब पवन अपनी पत्नी के शव को उसी ठेले पर रखकर अंतिम संस्कार के लिए श्मशान की ओर ले जा रहे थे। शहर की सड़कों पर काफी चहल-पहल थी, लोग आ-जा रहे थे, लेकिन किसी ने भी रुककर उस बिलखते बुजुर्ग की मदद करने की जहमत नहीं उठाई।
जब पवन से पूछा गया कि उन्होंने सरकारी एंबुलेंस या शव वाहन को क्यों नहीं बुलाया, तो उन्होंने रुंधे गले से कहा— “मुझे नहीं पता था कि एंबुलेंस कैसे बुलाते हैं, मैं तो बस उन्हें जल्दी से अस्पताल पहुँचाना चाहता था।”
पार्षद और स्थानीय युवाओं ने दिया सहारा
बुजुर्ग पवन करीब दो किलोमीटर तक शव को ठेले पर खींचते हुए मोतीनगर चौराहा पहुँचे। यहाँ मोतीनगर वार्ड के पार्षद प्रतिनिधि नरेश यादव और कुछ जागरूक युवाओं की नजर उन पर पड़ी। बुजुर्ग की हालत और स्थिति को देखकर उन्होंने तुरंत मोर्चा संभाला। मानवीय आधार पर उन्होंने न केवल बुजुर्ग को सांत्वना दी, बल्कि अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक सामग्री और वाहन की व्यवस्था कर अंतिम विदाई संपन्न कराई।
विकास की दौड़ में पीछे छूटती इंसानियत
यह घटना कई गंभीर सवाल छोड़ गई है।
क्या स्मार्ट सिटी का मतलब केवल चौड़ी सड़कें और चकाचौंध है… ?
क्या स्वास्थ्य सुविधाओं और एंबुलेंस सेवाओं की जानकारी का अभाव आज भी गरीबों की जान ले रहा है …?
सबसे बड़ा सवाल उस समाज पर है, जो सड़क पर किसी को तड़पते देख मोबाइल से वीडियो तो बना लेता है, लेकिन मदद के लिए हाथ आगे नहीं बढ़ाता।

