रायसेन: सत्ता का रसूख या जनता की मजबूरी ? बिजली की मांग करने पर ग्रामीणों को मंच से भगाया, छात्र परेशान
मकड़ाई एक्सप्रेस 24 रायसेन । मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के गैरतगंज तहसील अंतर्गत आने वाले ग्राम जुझारपुर से एक विचलित करने वाली घटना सामने आई है। जहाँ एक ओर प्रदेश सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुविधाओं की मांग करने पर जनता को अपमानित और प्रताड़ित करने के आरोप लग रहे हैं। मामला बिजली कटौती और सत्ताधारी नेताओं के कथित अड़ियल व्यवहार से जुड़ा है।
10 दिनों से अंधेरे में गांव, बोर्ड परीक्षार्थी बेहाल
ग्रामीणों के अनुसार, जुझारपुर गांव पिछले 10 दिनों से पूरी तरह अंधेरे में डूबा हुआ है। बिजली गुल होने के कारण सबसे ज्यादा परेशानी छात्रों को हो रही है। अगले महीने से बोर्ड परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं, लेकिन गांव में रोशनी न होने के कारण छात्र रात में पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। इसी समस्या को लेकर कुछ बच्चे और ग्रामीण एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पहुंचे थे, जहां बीजेपी जिलाध्यक्ष राकेश शर्मा और स्थानीय विधायक प्रभु राम चौधरी मौजूद थे।
मंच से ग्रामीणों को हटाने और दुर्व्यवहार का आरोप
प्रत्यक्षदर्शियों और वायरल खबरों के अनुसार, जब बच्चे अपनी फरियाद लेकर मंच के पास पहुंचे और बिजली चालू करवाने की गुहार लगाई, तो वहां मौजूद बीजेपी जिलाध्यक्ष राकेश शर्मा ने कथित तौर पर सहानुभूति दिखाने के बजाय उन्हें मंच से हटवा दिया।
इतना ही नहीं, मामले में विधायक प्रभु राम चौधरी का बयान भी चर्चा में है। आरोप है कि जब बच्चों ने लाइट न होने की शिकायत की, तो विधायक ने संवेदनहीनता दिखाते हुए कहा— “तुम्हारे मां-बाप कहां हैं, उन्हें तुम्हारी फिक्र नहीं है क्या?”
पुलिसिया कार्रवाई और ग्रामीणों में आक्रोश
सूत्रों और स्थानीय खबरों के मुताबिक, इस घटना के बाद मामला और बिगड़ गया। आरोप है कि अपनी जायज मांग रखने वाले एक ग्रामीण को थाने ले जाकर बिठाया गया और उसके साथ मारपीट भी की गई। सत्ता के इस कथित “नशे” और प्रशासनिक दबाव को लेकर ग्रामीणों में भारी रोष व्याप्त है।
गंभीर सवाल: राजधानी के पास अंधेरा क्यों ?
राजधानी भोपाल से सटे रायसेन और विदिशा जैसे जिलों में बिजली की यह स्थिति सरकार के ‘इन्वेस्टमेंट’ और ‘ग्लोबल प्रोजेक्ट्स’ के दावों पर सवालिया निशान लगाती है। एक तरफ बड़े बजट की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ गांव के बच्चे चिमनी की रोशनी में परीक्षा की तैयारी करने को मजबूर हैं। यह घटना लोकतंत्र में जन-प्रतिनिधियों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। यदि बिजली की मांग करना ‘अपराध’ माना जाने लगे, तो विकास के दावों की जमीनी हकीकत क्या है, यह समझना मुश्किल नहीं है।

