एलोपैथिक इलाज कर रहे AYUSH चिकित्सकों पर उठे सवाल, क्या स्वास्थ्य विभाग करेगा जांच या यूं ही चलता रहेगा इलाज?
हंडिया। तहसील मुख्यालय सहित आसपास के क्षेत्रों में संचालित निजी क्लीनिकों में BHMS, BUMS एवं अन्य AYUSH पद्धति से जुड़े चिकित्सकों द्वारा एलोपैथिक दवाइयों इंजेक्शन एवं ड्रिप के माध्यम से मरीजों का उपचार किए जाने की चर्चा है। हंडिया ही नहीं, बल्कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में मरीज इन क्लीनिकों में उपचार के लिए पहुंचते हैं। अधिकांश ग्रामीण मरीजों को चिकित्सक की डिग्री, पंजीकरण और उपचार पद्धति की जानकारी नहीं होती। वे इलाज की उम्मीद में सीधे निजी क्लीनिकों का रुख कर लेते हैं।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि संबंधित चिकित्सक किस वैधानिक प्रावधान के तहत एलोपैथिक उपचार कर रहे हैं और क्या यह उपचार वर्तमान नियमों के अनुरूप है। चिकित्सा क्षेत्र के जानकारों के अनुसार किसी भी चिकित्सक के अधिकार उसकी डिग्री, पंजीकरण एवं लागू कानूनों के अनुसार निर्धारित होते हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि क्षेत्र में लंबे समय से इस प्रकार की चिकित्सा पद्धति अपनाई जा रही है, तो क्या स्वास्थ्य विभाग ने कभी इन निजी क्लीनिकों का निरीक्षण किया? क्या संबंधित चिकित्सकों के पंजीकरण, उपचार पद्धति और वैधानिक अधिकारों का सत्यापन किया गया? यदि नहीं, तो आखिर क्यों?
जनहित के इस महत्वपूर्ण विषय पर स्वास्थ्य विभाग की भूमिका और कार्रवाई पर अब सभी की निगाहें टिकी हैं। मरीजों को यह जानने का अधिकार है कि उनका इलाज किस चिकित्सा पद्धति और किस वैधानिक अधिकार के तहत किया जा रहा है। यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की जानी चाहिए।
मकड़ाई समाचार इस जनहित के मुद्दे पर अपनी नजर बनाए रखेगा और स्वास्थ्य विभाग की ओर से होने वाली जांच, कार्रवाई अथवा आधिकारिक स्पष्टीकरण से अपने पाठकों को लगातार अवगत कराता रहेगा।

